
एक अमीर व्यापारी बहुत बूढ़ा हो गया था। उसके कोई बेटा नहीं था, लेकिन तीन भतीजे थे। मरने से पहले उसने तीन सुंदर मूर्तियाँ बनवाईं और एक वसीयत लिखी: “मेरी सारी संपत्ति उसी की होगी जो इन तीन मूर्तियों का सच समझे। वही मेरा सच्चा वारिस होगा।”
व्यापारी के मरने के बाद तीनों भतीजे दरबार में आ गए। हर एक कहता था, “मैं सच्चा वारिस हूँ।”
अकबर ने बीरबल से कहा, “बीरबल, इन तीन मूर्तियों और सच्चे वारिस का फैसला तुम करो।”
बीरबल ने तीनों मूर्तियों को ध्यान से देखा। तीनों एक जैसी लग रही थीं — वही ऊँचाई, वही रंग, वही मुस्कान। लेकिन बीरबल की तेज़ नज़र ने एक छोटी सी बात पकड़ ली।
उन्होंने तीनों भतीजों से कहा, “आपमें से हर एक इन मूर्तियों के बारे में एक-एक बात बताए।”
पहला भतीजा बोला, “ये सोने की हैं, बहुत कीमती हैं।”
दूसरा बोला, “इनकी बनावट बहुत बारीक है, कलाकार ने कमाल किया है।”
तीसरा चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “मूर्तियों से ज़्यादा ज़रूरी है कि चाचा जी की मेहनत और ईमानदारी को याद रखा जाए। संपत्ति तो आती-जाती रहती है।”
बीरबल मुस्कुराए। उन्होंने अकबर की ओर देखा और कहा, “जहाँपनाह, सच्चा वारिस यही तीसरा है। पहले दो सिर्फ़ मूर्तियों की कीमत और सुंदरता देख रहे थे। तीसरे ने दिल की बात कही। सच्ची विरासत सोने में नहीं, अच्छे गुणों में होती है।”
अकबर ने फैसला सुनाया कि संपत्ति तीसरे भतीजे को मिलेगी। बाकी दो को भी थोड़ा-थोड़ा हिस्सा दिया गया, लेकिन सच्चा वारिस वही घोषित हुआ।
तीनों मूर्तियाँ दरबार में रख दी गईं ताकि सबको याद रहे कि असली धन गुणों का होता है।
नैतिक शिक्षा: सच्ची विरासत धन-दौलत में नहीं, बल्कि अच्छे संस्कारों और ईमानदारी में होती है।
